बहरूपिया शहर में अपनी ज़िन्दगी ......


न जाने क्या चाहती है
मुझसे ये ज़िन्दगी।

जब भी कोई कदम बढ़ाया है
ज़हन में एक सवाल छोड़कर
उसका जवाब चाहती है
मुझसे ये ज़िन्दगी।

मेरी हर चाहत को तोड़ा है इसने
मेरा एक हमदर्द बनकर
उसके बदले मेरे आंसू चाहती है
मुझसे ये ज़िन्दगी।

जब भी मैं सोचती हूँ इसके बारे में
तो दिल से यही दुआ निकली है
मिल जाए इसे जो ये चाहती है
मुझसे ये ज़िन्दगी।

यू न रूठो मुझसे मेरी ज़िन्दगी एक बार तो
पूछो मुझसे मेरा इंसानी सफ़र
 कैसे इस बहरूपिये शहर में जी रही हू मैं....

अपनी तस्वीर बनाने में जुटे है....
सब यहाँ पर जैसा जो चाहता है
वैसे बनती है कहा.....
ना जाने क्या चाहती है
मुझसे ये ज़िन्दगी क्यों इस बहरूपिया शहर में बसी है मेरी ज़िन्दगी








निधि ...

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