जाको राखे साईयाँ, मार सकेना कोई
आज एक बार फिर
वो शहर के अखबार में लिखा गया
पर इस बार लावारिस लाश की
शिनाख्त वाले कॉलम में.......
वो शहर के अखबार में लिखा गया
पर इस बार लावारिस लाश की
शिनाख्त वाले कॉलम में.......
ससांर में सभी चीजें
एक दूसरे से मिल कर बनी है। अगर हम किसी को प्यार करते है तो बदले में प्यार मिलता
है किसी पर गुस्सा करते है तो उसके बदले मे गुस्सा मिलता है क्योंकि संसार कि सभी
चीजें एक दूसरे से मिलकर बनी हुई है जैसा देगे वैसा लेगे ये प्रकृति का नियम है
जैसा कि उसने इस वादे को निभाया भी 25 अप्रेल 2015 को नेपाल में जो हुआ बिना किसी
आहट के इतने बड़े इलाके में भूकंप आना ओर पल भर में तबाही मचा जाना यह इस बात का
सकेंत तो है कि प्रकृति के आगे इसांन मजबूर है उसने अब तक प्रकृति से जो लिया है
वो कब देने का वक्त आ जाये यह कहना मुश्किल है पर इस कहर के मजंर की शुरूवात हर
बार की तरह एक गरीब के घर से ही शुरू होती है शायद ये भाग्य ने तय किया हुआ है
क्योकि इस मंजर को देखने के बाद ऐसा ही ख्याल आता है कि धनकुबेरो ने इस प्रकृति के
साथ भी मोल-भाव कर लिया है । वैसे तो नेपाल मे अमीरो की संख्या ज्यादा नही है पर
जो है उनके महलों की इमारत हिमालय से भी ज्यादा मजबूत है। तभी तो नेपाल में मरने
वाले 5000 हजार लोगो में तो दूर की बात है। यहाँ तो घायलों में भी किसी एक बड़ी शख्सियत का भी नाम नही है ओर होगा भी कैसे वो तो खुद इस तबाही को विदेशी धरती से
देख रहे है ओर वो तब तक यहाँ का रूख नही करेगे जब तक हालात सामान्य नही हो जाते
बड़े ही विचारनीय बात है कि भारत के प्रधानमत्रीं के ट्वीट से कोइराला जी को ये पता
चलता है कि उनका देश तबाही के कगार पर खड़ा है। (वो ईलाज के लिए थाइलैँण्ड गए हुए
थे) वाके ही इसांनों की तरह ये प्रकति भी
समझदार है कि किसके घर को अधेरे में रखना है ओर किस को उजाले में यह घटना पहली नही
है इससे पहले भी हमने प्रकृति का कहर झेला है उत्तराखंड की तबाही के समय भी इस तरह
की ही कहानी दोहराई गई थी। ओर आज भी हमें भूकंप के आने पर चेताया जाता है कि भूंकप
आने पर खुले मैदानों की तरफ चले जाना चाहिए पर इस तरह का गुरू ज्ञान देने वाले
गुरू को कोई बताए कि अब वो दिन गए जब भूकंप आते थे ओर लोग बाहर निकल आते थे अब हमारे
पास वो खुले मैदान नही रहे जो पहले थे अब ना ही पहले जैसा पर्यावरण अब ऊँची-ऊँची
इमारते ओर उनके बीच में छोटे-छोटे पार्क जो ऊँची-ऊँची इमारतों में रहने वालो के
लिए खुले मैदान है। अब तो जैसे-जैसे हम प्रकृति से उसका हक मारेगे वो इस तरह हमें
बर्बादी का मजंर दिखाऐगी गंभीरता
से सोचें कि किसी दिन हमारे यहाँ भी भूकंप आ गया तो हम जान बचाने के लिए कहाँ
जाएंगे। लो फिर भूकंप आ गया,
तबाही मचा गया जो जख्म दे गया है वह जाने कब तक हरे रहेंगे, कोई कुछ नहीं कह सकता। राहत के छींटों और बयानों की बारिश, दौरों और घोषणाओं का दौर हर बार की तरह फिर चल पड़ा। कोई किसी को दोष देगा,
कोई पीठ थपथपाएगा। जो भूकंप पीड़ित हैं उनकी अपनी पीड़ाओं को वे
जानें। भूकंप भावी विनाश का चेतावनी है। धरती चेतावनी दे रही है, फिर भी हम संभलते नहीं, बात दो-चार-दस दिन की है, हो
हल्ला होगा, होता रहेगा। फिर कोई दूसरा मुद्दा आकर गर्मी
पैदा कर जाएगा। और हम सब भूल जाएंगे भूकंप
की त्रासदी को।

Good writeup
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