आज भी कुछ बाकी है...



                             

आज इन आँखो पर किसी का जोर नही था, बार बार अपने आपको समझाने में लगा हुआ था कुछ पुरानी बातों  को जीवंत अपनी आखो से देखना अपने ज़हन में उतारने की महज एक  कोशिश कर रहा था सब कुछ जानने के बाद  भी थोड़ा सा ओरों जैसा बनना चाहता था....... बात कुछ ऐसी थी 

सुबह का टाइम अक्सर मेरा मेरी कॉलेज की लाब्रेरी में निकलता है बस वो ही रोज़ का काम अखबार पढना पर आज की सुबह मेरे लिए कुछ नया सन्देश लेकर आई हो ऐसा मुझे एहसास तब हुआ जब मैं काफी देर से चल रहे शोर को पीछे मुड़कर देखना शुरू किया  बस वो ही एक पल था जिसको मैंने अपने दिल की गुल्क में डाल दिया आज  अनजान से व्यक्ति ने मुझे अपनें आपको ढूढ़ने के लिए मजबूर कर दिया वो इंसान मेरे कॉलेज के एक सफाई कर्मचारी थे


उनको एक काम दिया गया की लाब्रेरी की सभी अलमारियों को साफ़ करके उनमे वापस से किताबो को लगाना। उनका  काम बहुत आसान था पर खास क्या था इस में खासियत ये थी की जो इंसान कभी नही पढ़ा जिसने कभी किताबो को हाथ में नही लिया आज वो इंसान उन किताबो को अपने भगवान की तरह पूजता है।  उन  की खास बात ये थी की वो अपने पेरो से जूते निकाल कर उन अलमारियों में किताबे लगा रहे थे  मेरे लिए वो समय कुछ अजीब सा था क्योंकि मैं उनको इस तरह टकाटक नज़रो से उनको घूरे जा रही थी जैसे की मैंने कभी पहले आदमी और जूता नही देखा हो मैंने उनके काम के खत्म होने तक उनका इंतजार बहार बैठकर किया।

 वो जैसे ही आये मैंने उनसे कहा क्या मैं आपसे बात कर सकती हू और उन्होंने कुछ कहने के लिए अपने हाथ से मुझे इशारा करते मैंने उनसे पहले ही पूछ डाला आप किताबो को जूते उतार कर क्यों जमा रहे थे तब उन्होंने कहा कभी पढ़ा नही हू पर किताबों की इज्जत करना जानता हूँ जिस चीज़ की अहमियत तुम पढ़े लिखो को होनी चाहिए वो तुम लोगो को नही है तुम लोग सिर्फ अपने आते हो और चले जाते हो जिस के पास जो नही होता वो उसकी अहमियत तुम लोगो से ज्यादा समझता है वो ये कह कर चले गए उनके चलते कदमों के साथ मेरे चेहरे की लकींरे अपनी जगह खोजने लग गयी ये बात मुझे बहुत परेशान कर गयी पहले तो सोचा क्या सुबह सुबह अपना दिमाग ख़राब कर लिया मुझे भी क्या जरुरत थी ऐसे ही सुना गए इतने प्यार से बोलने पर इतना कड़वा बोल दिया हम क्या समझते नही है पर शाम होते होते मैंने उस बात को हर दिशा से सोचना शुरू किया और सुबह के सूरज के साथ वो बात मुझे अच्छे से समझ आ गयी वो एक अच्छी सीख के साथ मुझे एक नयी सोच को दे गए।

 जिसकी अक्सर मुझे तलाश रहती है कहने को तो ये एक मामूली सी बात है पर इस को एक दिशा में सोचा जाइये या अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी से जोड़ कर इस उदाहरण का सार निकला जाये तो बहुत कुछ निकल सकता है जीवन जीना सब को आता है। कोई अपनों के साथ जी रहा है और कोई अपनों से दूर हो कर पर असली जीवन जिसको सीखना है वो है। हम जिसको हमने एक नया नाम दिया है देश का भविष्य (आज का युवा) यानि की मैं और ये बात हम पर लागू होती है। क्यों की अपनी मंजिल से भटकने वाला युवा कल की सोच कैसें बन सकता है।   जो अपने सस्कारों से दूर हो रहा है और जब पेड़ अपनी जड़ से अलग होने लगे तो उसका अन्जाम क्या होता है वो आप खुद लगा सकते है इस बदलते परिवेश के साथ हम भी बदल रहे है। पर जिस पहचान से हम जाने जाते है उस तरफ ध्यान आकर्षित करना मेरा मकसद है युवा हम नाम के है, काम के नही  क्यों की आज भी बहुत कुछ बाकि है   ......................... हममे     (जैसे कि  सस्कांर खोता जा रहा है।) 

   ये तो बस मेरी निजी ज़िन्दगी का छोटा सा पन्ना था  जो मैंने आपके सामने अपने शब्दों में पेश किया जिसने मुझे एक सीख दी बदलाव अच्छा है पर अपनी पहचान में बदलाव अच्छी बात नही........



   
   

  
 

Comments

Popular posts from this blog