"गुरू की बली”


 वैसे तो किताबों में गुरू के बारे में बड़े बड़े वाक्य कहे गए है – जैसे गुरू ब्रहमा गुरू विष्णु, गुरू कुम्हार शिष्य कुभं है। अधंकार से प्रकाश की ओर गुरू ही ले जाता है वैसे ये सारी बात सत्य है लेकिन इन बातों से भारतीय राजनीति का कोई लेना देना नही है, क्योकि यहाँ गुरू की बली देने की प्रथा है इसके ताजे उदाहरण भी है ओर कुछ बासी भी जैसे जेपी आन्दोलन की बात की जाए जब लोकनायक जेपी ने आंदोलन की राग अलापी तो बहुत सारे नेता आगे आए जिनमें लालू,नीतिश,रविशकंर इन सभी ने दुनिया बदलने की शपत ली लेकिन जैसे ही इनका उल्लू सीधा हुआ यानी राजनीति चमकी ये लोग जेपी को छोड़ आगे निकल गए ओर नए उदाहरण में हमारे माननीय-समाननीय अण्ना जी का है जो भूखे बेचारे 13 दिन खुद मरे ओर केजरीवाल  मजे उठा रहे है यानी गुरू अपने गावँ में चेला सत्ता की छावँ में वही काम दुनिया की दीदी किरण बेदी सहित तमाम लोगो ने किया यानी गुरू की बली ओर एकदम ताजे उदाहरण में मोदी जी का उदाहरण लिया जा सकता है वो आडवाणी जी को मानते है ऐसा लोग कहते है और सत्य ही कहते है अगर इतिहास के पन्नें को पलटा जाए तो ऐसा लगता है कि गुरू ने शिष्य को कई बार संभाला है चाहे गुजरात के दगों का समय रहा हो या अटल जी के प्रकोप से बचाना हो गुरू ने ही मामला सभांला था लेकिन जब चेले को मौका लगा गुरू के लिए कुछ करने का तो मौका देख चौका लगाया और देश के प्रधानमंत्री बनने के गुरू के अंतिम सपने पर पानी फेर खुद देश की कमान सभांली तो दिया ना गुरू की बली”................

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